अरावली को लेकर गहलोत के दावे भ्रामक, 100 मीटर का मानदंड पहले से लागू: राजेंद्र राठौड़

जयपुर, 21 दिसम्बर 2025: भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में पूर्व ने​ता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा अरावली पर्वतमाला जैसे गंभीर पर्यावरणीय विषय पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार के विरुद्ध भ्रम फैलाना दुर्भाग्यपूर्ण है। करीब ढाई

EDITED BY: Mehra Rajesh Kumar

UPDATED: Sunday, December 21, 2025

अरावली को लेकर गहलोत के दावे भ्रामक, 100 मीटर का मानदंड पहले से लागू राजेंद्र राठौड़

जयपुर, 21 दिसम्बर 2025: भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में पूर्व ने​ता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा अरावली पर्वतमाला जैसे गंभीर पर्यावरणीय विषय पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार के विरुद्ध भ्रम फैलाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

करीब ढाई अरब साल पुरानी, विश्व की सबसे प्राचीन 700 किमी लंबी अरावली पर्वत श्रृंखला की कम से कम 100 मीटर ऊंचाई को ही अरावली हिल्स मानने को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई परिभाषा के संबंध में अशोक गहलोत द्वारा लगाए जा रहे आरोप न तो कानूनी तथ्यों पर आधारित हैं और न ही न्यायिक प्रक्रिया की समझ को दर्शाते हैं।

इस विषय से जुड़े सभी निर्णय राजनीतिक नहीं, बल्कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट और लिखित आदेशों के तहत लिए गए हैं। उन्होंने बताया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने दिनांक 20 नवंबर 2025 को अरावली के संरक्षण और खनन नियमन की रूपरेखा तैयार करते हुए अपने आदेश में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नेतृत्व में गठित समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए यह कहा कि अरावली से जुड़े जिलों में स्थित कोई भी ऐसी भू-आकृति जो आसपास के भू-भाग से कम से कम 100 मीटर ऊंची हो उसे ‘अरावली हिल्स’ माना जाएगा। इससे पूर्व 8 अप्रैल 2005 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालना में 100 मीटर से अधिक ऊँचाई को ‘हिल’ मानने का मानदंड तय किया गया, जिसे कांग्रेस सरकारों ने भी वर्षों तक लागू रखा था।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं में अवैध खनन का मुद्दा लंबे समय से चल रहा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने W.P. (सिविल) संख्या 4677/1985 (एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ और अन्य) और W.P. (C) 202/1995 (टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ) में अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं में अवैध खनन से संबंधित मामलों की सुनवाई करते हुए, 09.05.2024 को अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की एक समान परिभाषा प्रस्तावित करने के लिए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के सचिवों एवं विशेषज्ञों की समिति गठित की थी। समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद ही दिनांक 20 नवंबर 2025 को अंतिम निर्णय आया है। इसलिए इसमें किसी राजनीतिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। कमेटी की बातचीत में यह स्पष्ट तथ्य सामने आए कि अरावली क्षेत्र में खनन को नियंत्रित करने की औपचारिक परिभाषा केवल राजस्थान के पास थी जो 2002 की कमेटी रिपोर्ट और रिचर्ड मर्फी (1968) के लैंडफॉर्म क्लासिफिकेशन पर आधारित है।

इस परिभाषा के अनुसार स्थानीय ऊँचाई से 100 मीटर या उससे अधिक उठने वाली पहाड़ियों और उनकी ढलानों पर खनन प्रतिबंधित है और राजस्थान 9 जनवरी 2006 से इसका पालन कर रहा है यानी तब से ऐसी पहाड़ियों में कोई खनन पट्टा नहीं दिया गया। इसके बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा यह कहना कि केंद्र सरकार ने अरावली को 100 मीटर में सीमित कर दिया है, यह तथ्यात्मक रूप से गलत है, क्योंकि यही मानदंड कांग्रेस शासनकाल में तय और लागू हुआ था और 19 अगस्त 2003 को जिलेवार नक्शे तैयार करने के निर्देश भी उनके मुख्यमंत्री रहते जारी किए गए थे।

वर्षों तक इस परिभाषा को लागू रखने के बाद आज इसे गलत बताना न्यायिक फैसले को राजनीतिक रंग देने का प्रयास नहीं तो और क्या है ? पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने बताया कि अरावली को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा फैलाया जा रहा यह दावा कि “90 प्रतिशत अरावली समाप्त हो जाएगी”, पूरी तरह असत्य और भ्रामक है।

वास्तविक स्थिति यह है कि अरावली क्षेत्र का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा हिरसा अभ्यारण्य, राष्ट्रीय उद्यान और आरक्षित वनों में आता है, जहाँ खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके अलावा, पूरे अरावली क्षेत्र में से केवल लगभग 2.56 प्रतिशत क्षेत्र ही सीमित, नियंत्रित और कड़े नियमों के तहत खनन के दायरे में आता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्टरी रिसर्च एंड एजुकेशन द्वारा अरावली क्षेत्र का डिटेल्ड साइंटिफिक मैपिंग और सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान तैयार नहीं हो जाता

तब तक कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जा सकता। ऐसे में अरावली के नष्ट होने की बात करना गहलोत जी का सिर्फ भ्रम फैलाने का प्रयास है। 100 मीटर का मानदंड केवल ऊंचाई तक सीमित नहीं है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकृत परिभाषा के अनुसार 100 मीटर या उससे ऊँची पहाड़ियों, उनकी ढलानों और दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के क्षेत्र में आने वाली सभी भू-आकृतियाँ खनन पट्टे से पूरी तरह बाहर रखी गई हैं, चाहे उनकी ऊंचाई कुछ भी हो। यह व्यवस्था पहले से अधिक सख्त और वैज्ञानिक है। 18 दिसंबर 2025 को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अरावली बचाओ “Save Aravalli “के नाम पर सोशल मीडिया पर एक अभियान शुरू किया और अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदली। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि न तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा , न राहुल गांधी , न मल्लिकार्जुन खड़गे और न ही सचिन पायलट ने अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदली। यह साफ दर्शाता है कि जिस अभियान का दावा किया जा रहा है,

उसमें स्वयं उनकी पार्टी का समर्थन भी उनके साथ नहीं है। जब किसी मुद्दे पर पार्टी के शीर्ष नेता भी साथ खड़े न हों, तो स्पष्ट हो जाता है कि यह अभियान पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि राजनीतिक दिखावा है। अरावली जैसे संवेदनशील विषय पर प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेशों और वैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार ठोस कार्रवाई की आवश्यकता होती है। सर्वे ऑफ इंडिया के विश्लेषण से स्पष्ट है कि कमेटी की परिभाषा लागू होने पर अरावली क्षेत्र में खनन नहीं बढ़ेगा, बल्कि और अधिक सख्ती आएगी। राजस्थान के राजसमंद में 98.9%, उदयपुर में 99.89%, गुजरात के साबरकांठा में 89.4% और हरियाणा के महेंद्रगढ़ में 75.07% पहाड़ी क्षेत्र खनन से प्रतिबंधित रहेगा।

इसके अलावा, राष्ट्रीय उद्यान, इको-सेंसिटिव ज़ोन, रिज़र्व व प्रोटेक्टेड फ़ॉरेस्ट और वेटलैंड्स में खनन पूरी तरह बंद है। वर्तमान में अरावली क्षेत्र के 37 ज़िलों में कुल भौगोलिक क्षेत्र का केवल 0.19% (277.89 वर्ग किमी) हिस्सा ही कानूनी खनन पट्टों के अंतर्गत है जिसमें भी लगभग 90% खनन राजस्थान, 9% गुजरात और 1% हरियाणा तक सीमित है। इसलिए 90% अरावली हिल्स के खत्म होने की बात कानूनी और भौगोलिक रूप से पूरी तरीके से असत्य है।

केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव जी ने भी सार्वजनिक मंच पर स्पष्ट कर दिया है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से अरावली पर्वतमाला पर कोई आंच नहीं आएगी। केंद्र सरकार पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है कि अरावली को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा, अरावली पूर्णतः सुरक्षित और संरक्षित रहेगी । अरावली सुरक्षित है और रहेगी सरकार का रुख स्पष्ट है